सारंडा-वन अभ्यारण्य जल,जंगल,जमीन पर किसका राज ?- बिर सिंह बिरुली
Chaibasa: झारखंड सरकार को सारंडा को वाइल्ड लाईफ सेंचुरी 8 अक्टूबर 2025 तक घोषित करने की बात सुप्रीम कार्ट में रखना है। इसको लेकर 30 सितंबर को झारखंड सरकार के पांच मंत्रियों का समूह सारंडा जा कर आम लोगों के साथ रायशुमारी की। छोटानागरा के माटागुटू मैदान में आम सभा कर मानकी-मुंडा व पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय ग्रामीणों से जानना चाहा कि सारंडा वाइल्ड लाईफ सेंचुरी पर क्या राय है ?
24 अप्रैल 2024 को झारखण्ड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में सारंडा वन क्षेत्र के 575.19 वर्ग किमी क्षेत्र को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने हेतु शपथ पत्र दाखिल किया। यह बात समझ से परे है कि उक्त शपथ पत्र के विपरीत झारखंड सरकार ने क्यों और किन औधोगिक घरानों के फायदा के लिए पांच मंत्रियों के समूह(जीओ एम)का गठन किया है।
24 सितंबर 2025 को कैबिनेट ने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (जीओएम) में से कोई भी न पर्यावरणविद्, परिस्थितिविज्ञान शास्री, वनस्पति शास्त्री, भूगर्भ जल शास्त्री, पक्षी विज्ञानी और न ही मानव विज्ञानी है।
क्या सत्ताधारी दलों द्वारा बसों से लाए गए भीड़ के आधार पर ये पांच मंत्री कैबिनेट को किस प्रकार का रिपोर्ट सौंपेंगे..? 17 सितंबर, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश बी. आर. गवाई एवं न्यायधीश के. वी. विश्वनाथ के खण्ड पीठ ने झारखंड सरकार को फटकार लगाया और दिनांक 8 अक्टूबर, 2025 को मुख्य सचिव को सशरीर उपस्थित होने को कहा है। अन्यथा उनको आदेश का अनुपालन नहीं करने पर जेल भी सकती है।
यदि सर्वोच्च न्यायालय को उचित प्रतीत होता है। तो झारखण्ड सरकार के खिलाफ Mandamus (कोर्ट आदेश) जारी कर सारंडा को "सारंडा वन्य जीव अभ्यारण्य" घोषित करने का आदेश पारित कर सकता है।
झारखण्ड सरकार दो वर्षों से न्यायालय का आदेश नहीं पालन करने के पीछे की राजनीति और रणनीति से सारंडा में रहने वाले आदिवासियों को क्या और कैसे लाभ मिलेगा ? यह तो वक्त ही बताएगा।
झारखंड, पश्चिमी सिंहभूम सारंडा को सारंडा वन अभ्यारण्य बनाने के फायदे और नुकसान को आईए समझते है। यह आदिवासियों के लिए कितना लाभदायक और कितना नुकसानदायक है ?
सारंडा जंगल जिसे एशिया का सबसे बड़ा साल वन कहा जाता है। झारखंड का अनमोल प्राकृतिक धरोहर है। यहां घने साल वृक्षों के बीच हाथी, तेंदुआ, भालू, सांभर, हिरण, मोर और अनेक पक्षी-पशु प्रजातियां पाई जाती हैं। सरकार और पर्यावरणविद् लंबे समय से इसे "वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी" बनाने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही फायदे और नुकसान दोनों पहलू मौजूद हैं।
सारंडा वन्य अभयारण्य बनने के किया है नुकसान
1. स्थानीय लोगों का विस्थापन जंगल के अंदर और आसपास रहने वाले आदिवासी परिवारों को विस्थापन का डर रहेगा। उनका अस्तित्व, पहचान,परंपरागत जीवन, भाषा, लिपि, धार्मिक स्थल व शासनदिरी और संस्कृति प्रभावित हो सकती है।
2. आजीविका पर असर महुआ, साल बीज, लकड़ी, पत्ते और शहद जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर पाबंदी आने से ग्रामीणों की रोज़ी-रोटी प्रभावित होगी।
3. खनन और विकास कार्य ठप
सारंडा लौह अयस्क (Iron Ore) के लिए प्रसिद्ध है। सैंक्चुरी बनने से खनन और उससे जुड़े उद्योग बंद हो सकते हैं। जिससे रोजगार और राजस्व पर असर पड़ेगा।
4. कड़े नियम-कानून गांव के लोग खेती, मवेशी चराना, शिकार या लकड़ी लाने जैसी गतिविधियों में प्रतिबंध का सामना करेंगे।
5. संघर्ष की संभावना यदि सरकार बिना स्थानीय लोगों की सहमति लिए यह निर्णय लेती है, तो विरोध-प्रदर्शन और संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।
सारंडा वन अभ्यारण्य के बनने से लाभ
1. वन्यजीव और जैव विविधता का संरक्षण सैंक्चुरी बनने से जंगल के जानवरों और पक्षियों को सुरक्षित आवास मिलेगा। अवैध शिकार और पेड़ों की कटाई पर रोक लगेगी, जिससे जैव विविधता (Biodiversity) सुरक्षित रहेगी।
2. पर्यावरणीय संतुलन जंगल बचेंगे तो नदियाँ, झरने और जलस्रोत भी सुरक्षित रहेंगे। यह बारिश, ऑक्सीजन और जलवायु संतुलन के लिए जरूरी है।
3. पर्यटन और रोजगार सारंडा वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी इको-टूरिज्म का बड़ा केंद्र बन सकती है। ट्रेकिंग, जंगल सफारी, गाइडिंग, होटल, हस्तशिल्प और लोकल प्रोडक्ट्स से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा।
4. वैश्विक पहचान सैंक्चुरी बनने से सारंडा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। यह क्षेत्र झारखंड के पर्यटन नक्शे पर बड़ा आकर्षण बनेगा।
किया है निष्कर्ष
सारंडा जंगल के आदिवासियों जो सिंहभूम के मूल निवासी हैं। देश की नागरिकता से वंचित रखना उनके साथ अन्याय तो है ही झारखंड और देश के लिए शर्मनाक भी है। आदिवासियों के लिए क्यों गूंगी-बहरी बन जाती है अबुआ सरकार ? इन गांवों में 431 आदिवासी परिवारों के लगभग 2000 लोग निवास करते है, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड या आधार कार्ड जैसा कोई दस्तावेज़ नहीं है। स्पष्ट है कि कानूनी तौर पर वे इस देश के नागरिक नहीं हैं और उन्हें किसी भी समय सारंडा जंगल से बेदखल किया जा सकता है। सारंडा के ग्रामिण कहते हैं क्या हमने जंगल में रहकर कोई अपराध किया है ? 2011 की जनसंख्या के अनुसार 50 हजार की आबादी जंगल में निवास करती है। वर्तमान में यह आबादी 75 हजार से 1 लाख होने की उम्मीद की जा रही है। जोजोडेरा के 20 आदिवासी परिवारों के 105 लोग रहते हैं। जनवरी, 2008 में वन अधिकार कानून लागू होने के बाद गांव के लोगों ने मनोहरपुर अंचल कार्यालय में ज़मीन पर मालिकाना हक़ पाने के लिए आवेदन दिया लेकिन उनका आवेदन खारिज कर दिया गया। वे यह भी बताते हैं कि गांव के पास ही करमपदा में मित्तल कंपनी को लौह अयस्क का खनन करने के लिए ज़मीन लीज पर दी गयी है। और सरकार उन्हें वनभूमि का पट्टा इसलिए नहीं दे रही है। ताकि कंपनी को वन व पर्यावरणीय अनुमतियां लेने में परेशानी न हो। कुलाटुपा, मारीडा, टोपकोय, कोयनारबेड़ा, राटामाटी, रोगाडा, जमारडीह, टोयबो, कासीगाडा, गुंडीजोरा, छुमगदिरी, लैलोर बड़ीकुदार, जोजोडेरा, गतिगाड़ा, नुरदा इन गाँव में जनगणना तक नहीं हुई।
सारंडा को वन अभ्यारण्य बनाने का कदम प्रकृति और पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा। लेकिन स्थानीय लोगों की आजीविका और जीवनशैली पर गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर उन्हें वैकल्पिक रोजगार और पुनर्वास की गारंटी देकर ही कोई बड़ा कदम उठाए।
